हिंदू परंपराओं में ज्येष्ठ पूर्णिमा
ज्येष्ठ (मई-जून) की पूर्णिमा, जिसे ज्येष्ठ पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। यह पावन दिन उपवास, दान और भक्ति के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से माँ गंगा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना के लिए। माना जाता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के अनुष्ठान समृद्धि, पवित्रता और दिव्य कृपा प्रदान करते हैं।
वट सावित्री व्रत रखने वाली महिलाएं, जो अपने पतियों की भलाई और दीर्घायु के लिए देवी सावित्री की पूजा करती हैं, इस दिन को भी बहुत महत्वपूर्ण मानती हैं।
माँ गंगा की पूजा
भक्तों का विश्वास है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के शुभ दिन गंगा नदी में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और आत्मा शुद्ध होती है, जिससे यह माँ गंगा की आराधना के लिए एक पवित्र समय बन जाता है। भक्ति के रूप में, नदी को फूल, दीये और दूध अर्पित किए जाते हैं, आशीर्वाद की कामना करते हुए।
वट सावित्री व्रत: विवाहित महिलाओं के लिए एक विशेष उपवास
विवाहित हिंदू महिलाएं वट सावित्री व्रत रखती हैं, जो ज्येष्ठ पूर्णिमा का एक प्रमुख अनुष्ठान है, और अपने पतियों की भलाई तथा दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं। सावित्री और सत्यवान की कथा में निहित यह परंपरा सावित्री की अटूट भक्ति का उत्सव मनाती है, जिसने कथा के अनुसार, उनके पति को यम, मृत्यु के देवता, की पकड़ से पुनर्जीवित किया था। महिलाएं उपवास, प्रार्थना और बरगद के पेड़ पर पवित्र धागे बांधकर अपनी भक्ति प्रकट करती हैं।
सत्यनारायण पूजा और विष्णु आराधना
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर, कई हिंदू परिवार सत्यनारायण पूजा का आयोजन करते हैं, जो भगवान विष्णु के सम्मान में एक भक्तिपूर्ण अनुष्ठान है। इस अनुष्ठान में कथा-वाचन, मिठाइयों का भोग और सुख, सफलता तथा विपत्तियों से रक्षा की प्रार्थना शामिल होती है।
ॐ नमो नारायणाय! 🙏